भारतीय संस्कृति एवं वास्तुकला

 

भारतीय संस्कृति एवं वास्तुकला

            त्रिस्कन्ध[1] ज्योतिष के संहिता स्कन्ध में निहित वास्तुशास्त्र स्थापत्य वेद अर्थात् अथर्ववेद का उपवेद कहा जाता है। वेद शब्द का स्थापत्य के साथ सम्मेलन से वास्तु का वेद से सम्बन्ध स्वाभाविक ही दिखता है। इसी के अन्तर्गत वास्तुकला, चित्रकला, वास्तु सम्बन्धी नक्कासी इत्यादि आते हैं। वास्तु के वास्तविक अर्थ को देखा जाए तो आवास की कल्पना ही वास्तु है[2]। किन्तु आवास के साथ-साथ आवास का प्रकार कैसा हो यह भी वास्तु का ही विषय है। जिसमें ऋग्वेद के एक मन्त्र में चतुष्पद व मानवों के कल्याण हेतु आवास की कल्पना दृष्टिगोचर होती है।[3] वैदिक कालीन परम्परा में आवास इत्यादि हेतु भवन के लिए तीस से अधिक पर्याय मिलते हैं। जिससे स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति में वास्तु की अवधारणा मात्र आवास की परिकल्पना ही नहीं अपितु वास्तु का एक उत्कृष्ट स्वरूप प्रचलित था। जिसका प्रचलन पीढी दर पीढी चलते हुए भारतीय परम्पराओं से होते हुए संस्कृति  के रूप में आज भी जीवन्त रूप में प्रतिष्ठित है।

            सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की कल्याण भावना से ओत प्रोत हमारे पूर्वजों का संकल्प भारतीय संस्कृति के संरक्षण में ही रहा है। भारतीय संस्कृति में वास्तुकला का दृष्टिपात किया जाए तो दिग्-देश –काल का परस्पर सम्बन्ध व इनके प्रति पूर्वजों का ज्ञान एक आधारभूत प्रकल्प सिद्ध होता है। निवास के लिए स्थान का चयन, भूमि का परीक्षण, भूखण्ड का चयन व दिक्साधन जैसे वैज्ञानिक बिन्दु भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिकता को सिद्ध करते हैं। जिसमें शङ्कु द्वारा दिक्साधन की प्रक्रिया अत्यन्त प्राचीन व प्रामाणिक सिद्ध होती है जिसका समर्थन ज्योतिष के समस्त सैद्धान्तिक आचार्यों द्वारा प्रतिपुष्ट किया गया है। स्थापत्य वेद में स्थापत्य कला के विषय में कात्यायनशुल्बसूत्र, सिद्धान्तशिरोमणि, वासनाभाष्य में आचार्य भास्कर, ग्रहलाघव, सूर्यसिद्धान्त[4] जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों में दिक्साधन को महत्त्व दिया गया है जो वास्तुकला में मुख्य आधार है।

            वास्तु के आदि स्वरूप को देखें तो सर्वप्रथम वास्तुपुरुष की उत्पत्ति पौराणिक कथाओं के माध्यम से स्पष्ट होती है। जिसमें वास्तु को एक पुरुष के रूप में स्वीकार किया गया है।[5] वास्तु के स्वरूप के आधार पर निर्माण का निर्देश भी प्राप्त होता है। जिसमें मुख्य चार प्रकार ( भूमि,प्रासाद,शयन,यान) के वास्तु का उल्लेख मिलता है।[6] इसमें भूमि को मुख्य वास्तु के रूप में स्वीकार किया गया है।[7]

            लौकिक एवं पौराणिक साहित्य भारतीय परम्पराओं के बहुत निकट रहा है। भारतीय जनमानस की परम्पराओं का आधार लोक में प्रचलित कथाएँ व पौराणिक कथाएँ व उनमें निर्दिष्ट नियम व सिद्धान्त ही रहे हैं। तन्त्र-आगम जैसे विषयों में भी वास्तु का विशिष्ट  स्थान रहा है। श्री चक्र पूजन का निर्माण भी वास्तुकला को दृष्टि में रखकर निर्मित किया होगा। जिसमें श्री चक्र का मेरु रूप देवालय वास्तु के लिए कदाचित् प्रयोग किया गया होगा। श्रीचक्रमपि देवेशि मेरूरूपं न संशयः।[8]आवास देवालय या वापी कूपादि का निर्माण समस्त विषय वास्तु कला के अन्तर्निहित हैं। देवालय की मुख्य तीन शैलीयाँ (नागर-द्राविड़ एवं बेसर) हैं। इनमें भी प्रयोग किए जाने वाले चित्र इत्यादि व उनका अंकन वास्तु के अनुरूप करना वास्तुकला का ही उदाहरण हैं। जिनमें आठ प्रकार द्वारा चित्रों का कर्म करना निर्दिष्ट है।[9]  घरों के द्वारों पर की जाने वाली नक्काशी व लेप्य कर्म भी वास्तुकला के पुष्ट उदाहरण हैं जिनका लोक संस्कृति में व्यवहार किया जाता रहा है। इसमें प्रयोग होने वाले कूर्चों के विषय में पाँच प्रकार उपलब्ध होते हैं।[10] प्रायः हम लेखन इत्यादि के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली लेखनी का ही स्वरूप जानते हैं। किन्तु भारतीय संस्कृति के मूल में देखें तो चॉक का प्रयोग लेखन व रेखांकन के लिए किया जाता था। जिसका निर्माण करना व प्रयोग करना भारतीय वास्तुकला में निर्दिष्ट है।[11]

            राजाभोजकालीन सभ्यता व संस्कृति के वास्तु से हम सब परीचित हैं। उस काल में बने मन्दिरों व उनकी नक्काशी वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण रहे हैं। साथ ही पुरापाषाणकाल अथवा मध्यपाषाण काल की माने जाने वाली भीमवेटका की चित्रकलाएँ  उस समय की संस्कृति एवं वास्तुकला के अनुपम उदाहरण हैं। इनमें चित्रित मानवाकृतियाँ, पशुओं के चित्र, पशु-पक्षी युद्ध के चित्र, हाथी, घोडे व अनेक आकृतियाँ उस समय की सभ्यता में प्रकृति प्रेम व ज्ञान को दर्शाती हैं।[12]

 कालान्तर में वास्तुकला देवालय व दुर्ग[13]निर्माण में भी अपनी एक अलग पहचान के रूप में स्पष्ट हुई। जिसमें आठ प्रकार के दुर्गों व उनमें बनने वाले जालीदार गवाक्ष, देवालय में प्रयोग किए जाने वाले शुकनास व शिखर का निर्माण वास्तुकला के जीवन्त उदाहरण हैं।

भारतीय संस्कृति से भारत की धरोहरें हमेशा ही स्पर्श में रहीं हैं। भारतीय संस्कृति एवं वास्तुकला वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल की दीर्घ यात्रा में अपना परिचय देती रही है। इन्हीं परम्पराओं के कारण ही नगर विन्यास में जयपुर शहर, देवालय में रामेश्वरम्, कोणार्क का सूर्य मन्दिर, पौराणिक सन्दर्भों से ओतप्रोत दुर्ग एवं किले आज भी अपने यथावत् रूप में हमारे समक्ष दृष्टिगोचर होते हैं।

 

Dr.Vijay Kumar
vjpandit7@gmail.com

[1]सिद्धान्तशिरोमणि भूमिका

[2]बृहद्वास्तुमाला अध्याय 01 श्लो.04

[3]ऋग्वेद अध्याय 07-54-01

[4]सूर्यसिद्धान्त त्रिप्रश्नाधिकार श्लो. 01-04

[5]बृहद्वास्तुमाला अ.01 श्लो.04

[6]मयमतम् अ.02 श्लो.04

[7]वही

[8]ज्ञानार्णवतन्त्र ,श्रीयन्त्रम्-साधना एवं सिद्धि पृ.23

[9]समराङ्गणसूत्रधार अध्याय 71 श्लो. 15-16

[10]समराङ्गणसूत्रधार अध्याय 73, श्लो. 13

[11]समराङ्गणसूत्रधार अध्याय 72 श्लो. 04-09

[12]https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B6%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AF

[13]धन्वदुर्गं महीदुर्गं गिरीदुर्गं तथैव च ।

मनुष्यदुर्गमब्दुर्गं वनदुर्गं च तानि षट् ।।महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 87 श्लोक 05

3 टिप्‍पणियां :

  1. प्रणाम गुरुवर ,
    अत्यंत ही सुंदर व्याख्या, भारतीय संस्कृति और वास्तु शास्त्र के विषय में आपके द्वारा बहुत ही सारगर्भित तरीके से वर्णन किया गया है।
    हमें गर्व है कि हम वास्तु शास्त्र के विद्यार्थी हैं और आपके सानिध्य में रह कर हमें इस विषय में कुछ ज्ञान अर्जित करने का अवसर प्राप्त हुआ।
    - निलेश क्षीरसागर

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  2. आप का परिश्रम अनुकरणीय प्रशंसनीय सराहनीय अतुलनीय है।

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  3. आपने वास्तुशास्त्र की परम्परा को पुनः नए रूप देकर के जनमानस का उपकार किया

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