वास्तुपुरुष उत्पत्ति

वास्तुपुरुष उत्पत्ति 

                वास्तुपुरुष उत्पत्ति सिद्धान्त- एक अध्ययन

विश्व में भोजनवस्त्रादि की आवश्यकता की पूर्ति हेतु व निवास व्यवस्था के लिए एक आश्रय (आवास) की महती आवश्यकता होती है। शीत-वर्षा-गर्मी व प्राकृतिक आपदाओं से बचने व धर्म-अर्थ-कामादि पुरुषार्थ प्राप्ति के लिए भी आवास की आवश्यकता होती ही है। देव असुरादि स्थान विशेष में निवास करते हैं। जिस प्रकार वैकुण्ठ में विष्णु, कैलाश में शिव, स्वर्ग में इन्द्रादि देवता, पाताल में दानव,  पृथ्वी में मानवादि समस्त प्राणी निवास करते हैं। मानव द्वारा निर्मित गुफाओं


में गज-अश्व-ग्राम्य व वन्य पशु आदि निवास करते हैं। समुद्र में जलचर, वृक्ष के कोटरों में पक्षी, गुफाओं में सिंह व्याघ्रादि व बिलों में साँप- मूषक- चींटियां आदि निवास करती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आवासादि की आवश्यकता न केवल मनुष्यों के लिए अपितु समस्त जीवों को रही है।

            वैदिक काल से ही हमारे ऋषियों का चिन्तन मानव कल्याण व मानव सुख हेतु ही रहा है, जिसके फलस्वरूप कृत्रिमावास की कल्पना हुई। वहीं वास्तु के निचले स्तर से उत्कृष्ट स्तर तक के विकास की परम्परा कालान्तर में देखने को मिलती रही है। पर्णकुटी- लकडी के घर- मिट्टि के घर- ईंट के घर व पत्थर के घर का क्रमशः निर्माण इस परम्परा को प्रतिपुष्ट करता है।

वास्तु शब्द का अर्थ

वास्तु शब्द के पारिभाषिक अर्थ को बताते हुए मुनि यास्क ने स्पष्ट किया है कि निवास योग्य स्थान ही वास्तु है।[1]महर्षि पाणिनि के अनुसार वास्तु शाब्दिक उत्पत्ति वस् निवासे धातु में वसेस्तुन् वसेर्णिच्च[2]सूत्र से तुन् प्रत्यय लगने पर वस्तु शब्द बनता है, पुनः वस् धातु में णित्वादुपधावृद्धिः[3]तुन् प्रत्यय लगने पर वास् शब्द निष्पन्न होता है। वास् शब्द में पुनः तुन् प्रत्यय लगने पर वास्तु शब्द की व्युत्पत्ति होती है।

जो प्राणी जहाँ निवास करता है, वही उसका वास्तु कहा जाता है। निवासयुक्त भूमि को वास्तु की संज्ञा दी गई है। आचार्य विश्वकर्मा के अनुसार देव- नर- गजादि प्राणीयों के निवासयुक्त भूमि वास्तु कही गई है।[4]इस मत से स्पष्ट होता है कि न केवल मानवों के रहने का स्थान अपितु देवताओं के रहने का स्थान भी वास्तु संज्ञा से जाना जाता था। इस मत की पुष्टि मानसार[5]व वास्तु के लिए दी संज्ञा विभिन्न रूपों में विश्वकर्मवास्तुशास्त्र[6]ग्रन्थ में भी प्राप्त होती है। आचार्य कौटिल्य द्वारा सेतु बाँध[7]को भी वास्तु की संज्ञा दी गई है। कालान्तर में वास्तु का परिष्कृत रूप देखने को मिलता है। समय के साथ साथ वास्तु का यह परिवर्तन अपने इतिहास की यात्रा में अहम भूमिका निभा रहा था। वेश्मभूर्वास्तुस्त्रियाम्[8] वास्तु का परिवर्तित रूप देखने को मिलता है। वास्तु का अर्थ जहाँ निवास युक्तभूमि कहा है वहीं उस भूमि का अधिपति वास्तुपुरुष कहा जाता है। इस विषय में बहुत से मत शास्त्रीय ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं, जिनमें से कुछ मतों का प्रतिपादन करने का प्रयास इस शोध लेख में किया गया है।

वास्तुपुरुष उत्पति परिकल्पना

वास्तु विद्या का उद्भव वैदिक काल[9]से ही माना जाता है। क्योंकि वैदिक काल से ही मानव निवास के लिए प्रयासरत हो गया था। पर्वतों, वृक्षों व गुफाओं में निवास के बाद एक सुव्यवस्थित गृह का आवास के लिए प्रयोग होना वैदिक वास्तु में भी देखा जाता है। वैदिक वास्तु का जो आधार रहा है वह प्रकृति से किसी भी रूप में अछूता नहीं है। पञ्चतत्त्वों का प्रभाव जैसा ब्रह्माण्ड में देखा जाता है, वैसा ही पिण्डों में देखा जाता है। पञ्चतत्त्वों व आकर्षण शक्ति का उपयुक्त समायोजन ही वैदिकवास्तु का मुख्याधार रहा है, ऐसा वैदिककालीन वास्तु उदाहरणों से प्रतीत भी होता है।

वास्तुपुरुष उत्पत्ति की वैज्ञानिक परिकल्पना


 हमारे भारतीय दार्शनिक चिन्तकों की परम्परा के अनुसार समस्त सृष्टि पञ्चभूतात्मिका है। मानवशरीर भी पञ्चतत्त्वों के सम्मिश्रण से बना है, अतः परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इन शक्तियों का चुम्बकीय प्रभाव व भू-गर्भादिबल का प्रभाव मानव शरीर पर देखा जाता है। क्योंकि न केवल पर्यावरण पर अपितु मानव शरीर पर भी इन शक्तियों का प्रभाव[10]पडता है। उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों से पृथ्वी के उपर चुम्बकीय क्षेत्र के केन्द्रस्थ उर्जा का प्रभाव का चिन्तन भारतीय वास्तुशास्त्र की परिकल्पना का मुख्य आधार है। पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति का प्रभाव व आकर्षण का प्रतिपादन भास्कराचार्य[11]ने भी किया है।

इन्हीं प्राकृतिक शक्तियों का परिचिन्तन वास्तोष्पति के रूप में किया गया है। जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड एक ही पिण्ड से उत्पन्न होकर विस्तार को प्राप्त कर रहा है। जिसका वर्णन हिरण्यगर्भ सूक्त से हमें प्राप्त होता है। जिस प्रकार इस ब्रह्माण्ड में स्थित पञ्चतत्त्वों की परिकल्पाना एक विस्तृत स्तर पर की जाती है, उसी प्रकार लघुस्तर पर भी उन्हीं प्राकृतिक शक्तियों व पञ्चतत्त्वों की परिकल्पना वास्तुपुरुष के रूप में की जाती है। सम्पूर्ण पृथ्वी के वास्तु में भी उसी वास्तुपुरुष की परिकल्पना है जो एक नगर- भवन या एक कक्ष के लिए है।

वैज्ञानिक दृष्टि से यदि देखा जाए  तो चुम्बक के एक विशाल खण्ड में भी वही गुण प्राप्त होता है जो चुम्बक के एक छोटे से टुकडे में स्थित है। एक निश्चित स्तर पर इन प्राकृतिक शक्तियों का समायोजन ही वास्तुपुरुष की उत्तम स्थिति को प्रदर्शित करता है। इसीलिए वास्तुशास्त्र में विभिन्न वास्तुपदों[12]का वर्णन प्राप्त होता है, जहाँ छोटे झोंपडी- भवनादि से लेकर बडे प्रासाद या महल बडे स्तर के वास्तु निर्माण का वर्णन मिलता है, किन्तु एक वास्तुनिर्माण में एक ही वास्तुपुरुष की कल्पना की जाती है। वास्तुपदमण्डल में पैंतालीस[13]देवताओं की परिकल्पना भी की गई है। देवताओं की यह स्थिति एक ही पदमण्डल में विविध दैवीय शक्तियों (घनत्व) के प्रभाव को दर्शाती है। जिस प्रकार वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में परमाणु के केन्द्र में नाभिक  (न्यूक्लिअस) होता है जिसका घनत्व बहुत अधिक होता है। इसी के चारों ओर न्यूट्रॉन व प्रोटॉन चक्कर लगाते रहते हैं, जिससे परमाणु धन या ऋणावेशित[14]होकर ऊर्जा उत्पन्न करता है। जो उत्तर दिशा से दक्षिण की ओर बहने वाली चुम्बकीय तरंगों से भी प्रभावित होता है। अधिक घनत्व वाला पदार्थ अधिक आकर्षण शक्ति के साथ पृथ्वी के साथ जुडा रहता है। इसलिए पृथ्वी का घनत्व अन्य पिण्डों की अपेक्षा व मानव जीवन की अनुकूलता का चिन्तन कर मय ने भी भूमि को ही मुख्य वास्तु[15]की संज्ञा दी है।

वास्तुशास्त्र में इस सिद्धान्त को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, जहाँ दिशाओं के साथ तत्वों का उचित समायोजन न होने पर ऋण (आसुरी) एवं धनात्मक (दैवीय) शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है व जन समान्य को प्रभावित करती हैं। वास्तोष्पति के रूप में वेदों में जो प्रार्थना मन्त्र प्राप्त होता है उसमें भी मानव हित व मानव हित व रक्षा की कामना[16]की गई है। जिससे हमें प्रतीत होता है कि हर वो ऊर्जा के स्रोत (सूर्य- अग्नि- जल- वायु- वनस्पति आदि ) जो मानव कल्याण में प्रयुक्त थी, या जिसकी शक्ति को मानव ने पहचाना उसे देवता की कोटि में रखा जाने लगा। इसी तरह गृह की परिकल्पना में पञ्चतत्त्वों- गुरुत्व व प्राकृतिक शक्तियों का समायोजन कर उस शक्ति पुञ्ज को वास्तुपुरुष के रूप में वास्तु देवता जाना गया।

प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में सांस्कृतिक परम्पराओं का विकास होता रहा है। सांस्कृतिक विकास के साथ साथ वैदिक परम्पराएँ भी उतना ही पुरानी हैं। वैदिककालात् पूर्व से ही वास्तु के अद्भुत् उदाहरण देखने को मिलते हैं। सर्वप्रथम वास्तु उत्पत्ति कैसे हुई? व कैसे वास्तु के विविध रूपों का निष्पादन हुआ, यह सब विषय अपने आप में एक शोध का विषय आज के समय में बने हुए हैं। क्योंकि वास्तुशास्त्र की दृष्टि में इन सब विषयों का आध्यात्मिक व वैज्ञानिक कारण अध्ययन व अन्वेषण का एक केन्द्र बना हुआ है।

वास्तुपुरुष उत्पत्ति की वैदिक व आध्यात्मिक परिकल्पना

सृष्टि के आदिकाल से ही मानव जीवन को अस्तित्त्व में आने के लिए कई लाख वर्षों का समय लगा। मानव जीवन सम्भवतया अन्धकार युग के बाद ही अस्तित्त्व में आया होगा। वैदिक ज्ञान अपौरुषेय होने के कारण सृष्टि उत्पत्ति व वास्तु उत्पत्ति मत को कहीं न कहीं परस्पर सम्बन्धित करते हैं। वेदों में वास्तु की उत्पत्ति के विषय में कोई स्पष्ट मत प्राप्त नहीं होता है किन्तु बहुत से पौराणिक मतों से यह स्पष्ट होता है कि वास्तु की उत्पत्ति या वास्तुपुरुष की उत्पत्ति सतयुग व त्रेतायुग के सन्धिकाल[17]में हुई है। किन्तु कुछ समय पूर्व की बात की जाए तो और आज के वैज्ञानिक मत बिग-बैंग थ्यूरी का सम्बन्ध हिरण्यगर्भ सूक्त के हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्[18]मन्त्र से सम्बन्धित प्रतीत होता है। सम्भवतः हिरण्यगर्भ, जो समस्त भूतों का अधिपति है, वही वास्तु का आदि रूप कहा जा सकता है। क्योंकि यह घटना जितनी सृष्टि उत्पत्ति से सम्बन्ध रखती है उतनी ही वास्तु से सम्बन्धित है। जब सृष्टि  उत्पत्ति की कल्पना की गई तभी काल की उस अवस्था का ज्ञान हुआ जिसके अन्तर्भूत होकर ही सृष्टि की गणना का क्रम शुरू हुआ। किन्तु देश और दिक् का सम्बन्ध बनने के लिए कई हजार वर्षों का समय लगा होगा क्योंकि वास्तु की कल्पना या वास्तुपुरुष की उत्पत्ति का कल्पना बिना दिशाओं के असम्भव सी प्रतीत होती है। वैदिक काल जब देश व दिशा के महत्त्व को भली प्रकार समझा जा चुका था, तब वास्तु के सन्दर्भ[19]चाहे वो प्रार्थना क्रम में हों या एक मात्र परम्परा क्रम में, प्राप्त होने लगे थे। शुक्लयजुर्वेद में प्राप्त इस मत के आधार पर यह समझा जा सकता है कि वास्तु का सम्बन्ध सबसे पहले अधिष्ठाता शिव हैं। जिनके द्वारा कैलाश पर्वत पर निवास योग्य वास्तु निर्माण करने से उन्हें वास्तु अधिष्ठाता[20]के रूप में जाना जाता है। इसा सन्दर्भ में दूसरा मत में भी वास्तु का सम्बन्ध भगवान शिव[21] से बताया गया है। जिसमें वास्तु पुरुष की उत्पत्ति भगवान शिव के स्वेदकण से बताई गई है। पृथ्वी पर इस कण के गिरने से यह  कण फैलता चला गया। जिसे एक अन्तिम रूप में आते- आते वास्तुपुरुष के नाम से जाना जाने लगा।

आचार्य विश्वकर्म के अनुसार वास्तुपुरुष की उत्पत्ति  भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की तृतीया शनिवार कृत्तिका नक्षत्र में व्यतीपात योग विष्टि करण में मानी गई है।[22]  राजवल्लभवास्तुशास्त्रम् वास्तु के मानक ग्रन्थ में प्राप्त होता है कि भगवान रूद्र और अन्धकासुर के बीच युद्ध  हुआ। कृतयुग के अन्त व त्रेता के आदि के सन्धिकाल में युद्ध के दौरान भगवान शिव के मस्तक  से स्वेदकणभूमि पर गिरा जिससे आकार में बृहद्भूत की उत्पत्ति हुई। पृथ्वी को भक्षण करने में उद्धृत उस दैत्य को ब्रह्मा की आज्ञा से देवताओं द्वारा उस दैत्य को पृथ्वी में अधोमुख गाढ दिया गया व उसे ब्रह्मा द्वारा वास्तुपुरुष की संज्ञा दी गई[23]

इस सन्दर्भ को यदि आधुनिक स्ट्रिंग सिद्धान्त से जोडा मिलाकर देखा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। जहाँ कण के रूप में इलैक्ट्रोन-प्रोटोन व न्यूट्रान से पिण्डों का निर्माण व गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त से सम्बन्ध को दर्शाया गया है। इलेक्ट्रॉनस प्रोटॉन  आदि मूलभूत कणों  को पहले बिंदु सदृश पदार्थ समझा जाता था। इसी को विषय में आज कहा जाता है कि मूलभूत कण तन्तु की तरह हैं और ब्रह्माण्ड तंत्रियों से भरा पडा है। जो गुरुत्वाकर्षण पर आधारित है, व इसी सिद्धान्त से गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न उर्जा का मापन किया गया जो क्वाँटम सिद्धान्त के बराबर उर्जा को दर्शाता है। जिसमें वास्तु के इस कण रूप को स्पष्ट करते हुए उसकी पृथ्वी पर अवस्थिति को दर्शाया जा सकता है। जो कि गुरुत्वशक्ति व सौरशक्ति जैसी प्राकृतिक शक्तियों के समन्वय को दर्शाए हुए है।[24]किन्तु इन सब मतों की प्रतिपुष्टि करने के लिए वास्तुशास्त्र का एक मुख्य विन्दु है, दिग् एवं काल का निर्धारण जिनके बिना इन तत्त्वों के समायोजन से मिलने वाली उर्जा का लाभ प्रत्यक्ष रूप से मानवकल्याण हेतु प्रयोग हो सके।

उपसंहार

 वास्तुपुरुष की उत्पत्ति के पश्चात् उस स्थान में वास्तु पदों का निष्पादन किया गया जिसमें सोलह से एक हजार तक के वास्तु पदों के विन्यास का वर्णन प्राप्त होता है[25]-

                                    एकपदादितो वास्तुर्यावत् पदसहस्त्रकम्।

                                    द्वात्रिंशमण्डलानि स्युः क्षेत्रतुल्याकृतीनि च।।

                                    एकाशीति पदो वास्तु चतुषष्टिपदोथवा।

सर्ववास्तु विभागेषु पूजयेन्मण्डलद्वयम्।।

वास्तुपुरुष की उत्पत्ति के पश्चात कालान्तर में वैदिक काल में ही तत्सम्बन्धी प्रार्थना मन्त्र भी प्राप्त होते हैं। जिसमें वास्तुपुरुष को विश्वरूप के रूप में माना गया है- अमीवहा वास्तोष्पतेः विश्वा रूपाण्यविशन्। सुखा सुशेव एधि नः।।[26]

            कालान्तर में वास्तु के बहुत से पर्याय व वास्तु के विविध भेद दृष्टिगोचर होते चले गए। वास्तु का मुख्य प्रयोजन निवास की अवधारणा को आगे बढाते हुए वास्तु के सदुपयोग व मङ्लार्थ वास्तुपुरुष के पूजन व रक्षा प्रार्थना  भी मानवहित कर्म के रूप में सिद्ध होता है। वास्तुशास्त्र में जहां वास्तुपुरुष की कल्पना की गई है वहीं सृष्टि आदि से ही उसकी सत्ता को हम उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर मान सकते हैं। वहीं दूसरी और अध्यात्म व पौराणिक मतों से स्पष्ट करने का अभिप्राय व वास्तु उत्पत्ति के वही वैदिक मत एक कथानक के रूप में हमारे पौराणिक सन्दर्भ व वास्तु के स्वतन्त्र-शास्त्र के रूप में वर्णित हैं।

वास्तुपुरुष उत्पत्ति के विषय में कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वास्तुपुरुष उसी काल का खण्ड है, जो ज्योतिष शास्त्र के फलित स्कन्ध  में कालपुरुष, सिद्धान्त स्कन्ध में शङ्कु के रूप में ग्रहण किया जाता है।  क्योंकि कालपुरुष अर्थात् काल व शङ्कु का अर्थ वास्तु में दिग्ज्ञान, तीनों में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध प्रतीत होता है। अतः दोनों (काल एवं दिग्) के बिना वास्तुपुरुष की कल्पना करना असम्भव है। जहाँ हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वास्तुशास्त्र में दिशाओं एवं काल का स्थान वही है, जैसे एक शरीर में रीढ की हड्डी का होना। एतदर्थ कालपुरुष व शङ्कु के बिना वास्तु की कल्पना करना ही मुश्किल है। अतः जहाँ वास्तुपुरुष की परिकल्पना करते हुए देवताओं का स्थापन दिशाक्रम को निर्धारित किया गया है, वह दिग्ज्ञान के बिना असम्भव है।  वास्तुपुरुष की कल्पना कर पदविन्यास में देवताओं का समुचित स्थापन  ही एक उत्तम वास्तुपुरुष के स्वरूप को दर्शाता है, जो आध्यात्मिक- दैविक- वैज्ञानिक व भौतिक दृष्टि से वास्तुकर्ता के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है। 

डॉ. विजय कुमार

Vjpandit7@gmail.com

 



[1] निरुक्त 10.02.06

[2] उणादिप्रकरण सूत्र- 75

[3] द्रष्टव्य वास्तुशास्त्रविमर्श ,श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ, वास्तुशास्त्र विभाग नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित

[4] देवतानां च नराणाञ्च गजगोवाजिनामपि।

 निवासभूमिशिल्पज्ञैर्वास्तु संज्ञमुदीरितम्।। विश्वकर्मवास्तुशास्त्रम् अ.07 श्लो.01

[5] तैतिलाश्च नराश्चैव यस्मिन्यस्मिन् परिस्थिताः।

 तद्वस्तु सूरिभिः प्रोक्तं तथा वै  वक्ष्यतेऽधुना  ।। मानसार अ.03 श्लो.01

[6] इष्टिका च शिला दारूरयः कीलादयोप्यमी।

 वास्तु कर्मणि चान्यत्र वास्तु संज्ञमुदीरितम्।। विश्वकर्मवास्तुशास्त्रम् अ.07 श्लो.61

[7] गृहं क्षेत्रमारामः सेतुबन्धस्तटाकमाधारो वा वास्तुः।। अर्थशास्त्र अधिकरण03, अध्याय 08

[8] अमरकोष,काण्ड-02.19

[9] ऋग्वेद 07.54.02

[10] वास्तुप्रवोधिनी पृष्ठ 04

[11]  आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत्खस्थं, गुरुस्वाभिमुखं स्वश्क्त्या।

   आकृष्यते तत्पततीव भाति, समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।। सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्यायः, श्लो.04

[12] मयमतम् अ.07

[13]  तत्रैव श्लो.34-42

[14] परमाणु विकीपीडिया https://hi.m.wikipedia.org

[15] मयमतम् अ.02 श्लो.02

[16] वास्तोष्पतेः प्रतिजानीह्यस्मान् स्वावेशो अनमीवो भवा नः।

  यत्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शन्नोभव द्विपदे चतुष्पदे।। ऋग्वेद 07/54/01

[17] बृहद्वास्तुमाला अध्याय 01 श्लोक01

[18] ऋग्वेद 10-12-07

[19] नमः वास्तव्याय च वास्तुपाय च।।

[20]  वास्तुशास्त्र विमर्श पृ.09एवं27

[21]  प्रासादमण्डनम् अ.08श्लो. 96-98

[22] विश्वकर्मप्रकाश पृ.19-20

[23]बृहद्वास्तुमाला अ.01 श्लो. 01

[24] इलैक्ट्रानिकी आपके लिए- सटीफन हॉकिंग विशेषांक में शुकदेव प्रसाद द्वारा लिखित दिक् और काल के सजग प्रहरी लेख से।

[25] प्रासादमण्डनम् अ.08,श्लो101-102

[26]ऋग्वेद 07-55-01

1 टिप्पणी :

  1. शोधलेख को पढकर महान् सन्तोष हुआ। आपका वास्तुशास्त्र के लिए योगदान अकल्पनीय है।

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